आखिर कब तक?
माथे की शिकन अब दर्द देने लगी है। अल्फाज़ गले तक भर आएं है। आखिर कब तब उस ज्वाला को अपने अंदर दबाया जा सकता है? अपनी आभासी हिफाज़त भी अब जवाब देने लगी है। ऐसा लगता है मानो हमला करने के सिवा और कोई दूसरा रास्ता अब मौजूद नहीं। सोचती हूं निहत्थे बैठे वांगचुक को घसीट कर ले जाती पुलिस, या फिर आदिवासियों की चीख को अनसुना कर उन्हें चिता पे मरता छोड़ देना, या ऋषिकेश और निकोबार में पेड़ों को काट देना, इनमें से कौनसा जुर्म ज़्यादा संगीनतर है। आखिर कब तक हम इस गंध भरी नहर का पानी चुपचाप पीकर तानाशाहों के घर सींचेंगे?
आप हिंदुस्तान को लोकतांत्रिक देश बताते हैं। बाबा साहब अंबेडकर ने एस्थेटिक्स के लिए संविधान नहीं लिखा था। उस संविधान का एक उद्देश्य था, एक मतलब था जो आज किसी सड़क पर पड़ी कुतिया की तरह कुचल दिया जाता है। अधिकार अब खोखले हो चले हैं जो बस सिविक्स की बुक्स में अपनी आखिरी साँसें लेते दिखते हैं। रेंगता, बिलबिलाता नागरिक सरेआम कॉक्रोच कह दिया जाता है। इस सड़ी हुई राजनीति की बू से बचने के लिए आज कल ‘एपोलोटिकल’ लोगों ने अपनी ईमारतें और ऊंची कर ली हैं।
गुस्सा आता है मुझे ऐसे लोगों पर। समाज के हर उस हिस्से पर जो अपने पाखण्ड और अपने खोखलेपन को उन शराब की महफिलों में बेनकाब करता है। गुस्सा आता है उनके इंडिफरेंस पे। सामाजिक प्रतिबद्धता उनके लिए एक टाइम पास है। वे रेवोल्यूशन को लेफ्टिस्ट रोमैंटिसिज़म बताकर अगले ही पल टेलर स्विफ्ट की शादी पर खुशी के आंसू बहाने के लिए खुद को तैयार करते पाए जाते हैं।
लोग लड़ पड़ते हैं अपने पसंदीदा क्रिकेटर या सेलिब्रिटी का पक्ष लेने के लिए मानो उन्हें इस बात के पैसे मिल रहे हों। एक ऐसी शख्सियत जो आपका वजूद तक नहीं जानती, उसके लिए मां बहन की गली दे दी जाती है। मगर जब इन्हीं कॉक्रोच कहलाए जाने वाले इनके फैंस के लिए कुछ करने का समय आता है, तो अक्सर ये मुखर आवाज़ें धीमी पड़ जाती हैं। आमिर खान को एक दम से याद आता है कि वो तो सोनम वांगचुक को जानते तक नहीं। दिलजीत को याद आता है कि वे एक आर्टिस्ट हैं और उनका पॉलिटिक्स से कोई मतलब नहीं। सोचती हूं अपनी कायरता का चोला पहन ये कैसे खुद को रोज़ाना आईने में देखते होंगे। अगर आप सरकार के पैरों पर जीभ रगड़ने के लिए प्रोपेगेंडा फिल्में बना सकते हैं तो फ़िर खुद को एपॉलिटिकल बुलाकर ये फ़रेब या ढकोसला तो न करें। आपका ऐसी फिल्में बनाना भी एक किस्म की राजनीति है।
“आर्ट इज़ पॉलिटिकल, एवरीथिंग इस पॉलिटिकल”


मेरे अंदर का नागरिक इतना लहूलुहान है कि मैं शायद उसकी हालत का ब्यौरा भी ठीक से न दे पाऊं। एक अजीब सी छटपटाहट है अपना वजूद ढूंढने की। ये देश जितने साल पीछे जा चुका है इस बात का अंदाज़ा तक नहीं लगाया जा सकता। वे इसी तरह लोगों को निगलते रहेंगे और हम इसी तरह खुद को एपॉलिटिकल साबित करने में लगे रहेंगे। जिस दिन आपका अपना कोई इस सिस्टम की बली चढ़ेगा, उस दिन शायद आपको ये चुभन, ये दर्द महसूस होगा मगर तब शायद बहुत देर हो चुकी होगी। जब देश के प्रधानमंत्री का पॉलिटिकल मैनोपॉज़ आ जाता है तब वह अपने साथ पूरे देश को बाँझ बना देता है। किसी पार्टी या नेता को जब आप इतना बड़ा बना दें कि आपको सही गलत में अंतर समझ आना बंद हो जाए, समझ लीजिएगा कि आपके अंदर का नागरिक एक गद्दार वाली मौत मर चुका है।
“हम मायूस नहीं हैं, हम हैरान नहीं हैं
जैसा सोचा था तुम वैसे ही निकले।
रात में सूरज लाने का वादा करके
दिन में रात उगा कर दिखला दी तुमने।
पानी पानी कहकर बरसाया तेज़ाब
और एक आग लगाकर दिखला दी तुमने।
सच भी झूठा झूठा लगने लगता है
झूठ भी इतनी सच्चाई से बोलते हो
फर्क कहाँ करते हो तुम बाशिंदों में
बस मज़हब के काँटे पर ही तोलते हो।
है दस्तूर कि सुबह होने से पहले
रातों का गहरा हो जाना लाज़िम है
ज़ुल्म बढ़ाओ, अभी तुम्हारे जुल्मों का
हद से बाहर हो जाना भी लाज़िम है।
हम मायूस नहीं हैं, हम हैरान नहीं हैं
जैसा सोचा था तुम वैसे ही निकले।”
- विशाल भारद्वाज


//जब देश के प्रधानमंत्री का पॉलिटिकल मैनोपॉज़ आ जाता है तब वह अपने साथ पूरे देश को बाँझ बना देता है// 🔥💯